हरेश्वर राय: ज्ञान के बंद दायरों से परे

"इस सारगर्भित परिचय को इतने ध्यान और सूक्ष्मता से लिखने के लिए प्रो. नीता सिंह का हार्दिक धन्यवाद। मेरे कार्यों, भोजपुरी काव्य-शास्त्र के प्रति मेरे अनुराग और सुलभ शिक्षा के लिए मेरी प्रतिबद्धता को उनके द्वारा दिए गए इस उदार सम्मान से मैं वास्तव में सम्मानित महसूस कर रहा हूँ।"
 - हरेश्वर राय

हरेश्वर राय: ज्ञान के बंद दायरों से परे

प्रो. नीता सिंह
अतिथि विद्वान, अंग्रेजी विभाग
शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सतना (म.प्र.)


सार-संक्षेप (Abstract)

यह परिचायात्मक लेख डॉ. हरेश्वर राय की बौद्धिक यात्रा का अध्ययन प्रस्तुत करता है। इसमें समकालीन भारतीय अकादमिक विमर्श के भीतर उत्तर-औपनिवेशिक प्रवासी साहित्य-समीक्षा, लोक-भाषा भोजपुरी के काव्य-शास्त्र, और ज़मीनी स्तर पर शिक्षा के लोकतंत्रीकरण के अभूतपूर्व संयोजन को रेखांकित किया गया है।

समकालीन उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श में, क्षेत्रीय भाषाई अस्मिता और वैश्विक अकादमिक मानकों के बीच का तनाव एक प्रमुख बहस का विषय रहा है। पीएम कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सतना में अंग्रेजी के प्राध्यापक डॉ. हरेश्वर राय का चार दशकों का अकादमिक जीवन इस बात का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करता है कि कैसे इन परस्पर विरोधी शक्तियों को एक सुसंगत और सशक्त बौद्धिक साधना में ढाला जा सकता है।

I. लोक-रंगमंच से आलोचनात्मक सिद्धांत तक

डॉ. राय की आख्यानात्मक साहित्य में रुचि की शुरुआत किसी विश्वविद्यालय के सेमिनार हॉल से नहीं, बल्कि रोहतास (बिहार) की ग्रामीण रामलीला के लोक-रंगमंच से हुई। प्रदर्शनकारी कलाओं और मौखिक परंपराओं के इस शुरुआती अनुभव ने उनके बाद के शोध-कार्यों की सुदृढ़ नींव रखी।

पटना विश्वविद्यालय में, डॉ. आर.सी. प्रसाद और डॉ. कामेश्वर प्रसाद जैसे महान विद्वानों के मार्गदर्शन में उनकी आलोचनात्मक चेतना को आकार मिला। स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के पश्चात्, उन्होंने अपनी अकादमिक दृष्टि को विस्तृत करते हुए विधि (LL.B.) और शिक्षा (B.Ed.) में अंतरविषय योग्यता अर्जित की। यह यात्रा ए.पी.एस. विश्वविद्यालय, रीवा से पूर्वी अफ्रीकी-एशियाई प्रवासी साहित्य पर केंद्रित उनके शोध प्रबंध—"डायस्पोरिक आर्टिकुलेशन इन द नॉवेल्स ऑफ एम.जी. वसांजी"—के साथ डॉक्टरेट में परिणत हुई।

डॉ. राय ने कई महत्वपूर्ण आलोचनात्मक ग्रंथों की रचना की है, जिनमें शामिल हैं:

डायस्पोरिक आर्टिकुलेशन इन द नॉवेल्स ऑफ एम.जी. वसांजी
वैराइटीज ऑफ इंडियनिटी इन द वर्क्स ऑफ एम.जी. वसांजी एंड रोहिंटन मिस्त्री
डायस्पोरा एंड इंडियन डायस्पोरा: ए ब्रीफ स्टडी

इन कृतियों के माध्यम से वे 'दोहरे-प्रवासन' (Double-Migration), सांस्कृतिक विस्थापन, स्मृतियों के प्रति मोह और अस्मिता के संरक्षण जैसे सूक्ष्म विषयों का विश्लेषण करते हैं। उन्होंने अपने लेखन में पारसी और गुजराती प्रवासी चेतना के अंतर को अत्यधिक विश्लेषणात्मक सटीकता के साथ रेखांकित किया है।

II. ज़मीनी सक्रियता और वंचित वर्ग का पक्षधरत्व

अकादमिक उपलब्धियों के साथ-साथ, डॉ. राय का करियर सामाजिक प्रतिबद्धता से भी गहराई से जुड़ा रहा है। बी.एस.एस. कॉलेज, बचरी (पीरो) में व्याख्याता (1987-1995) के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने अनुमंडल बनाओ संघर्ष समिति का नेतृत्व किया। उनके जन-आंदोलन के परिणामस्वरूप बिहार सरकार ने पीरो को आधिकारिक रूप से अनुमंडल (Sub-Division) घोषित किया।

युवा कला मंच के माध्यम से उन्होंने सामाजिक नागरिक साक्षरता के सशक्त माध्यम के रूप में 'नुक्कड़ नाटक' को आगे बढ़ाया, और साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए किफायती अध्ययन केंद्रों का संचालन किया।

III. डिजिटल लोक-संरचना और नवाचार

अकादमिक प्रकाशन जगत के अभिजात्यवादी ढांचे को चुनौती देते हुए, डॉ. राय ने एक खुले-पहुंच (Open-Access) वाले डिजिटल ढांचे का निर्माण किया। इसका मुख्य उद्देश्य वैश्विक अकादमिक अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाई समुदायों के बीच की दूरी को मिटाना है:

EngLitMail (englitmail.com): एक विस्तृत डिजिटल ज्ञान-कोश, जिसमें साहित्यिक इतिहास, आलोचनात्मक सिद्धांत और व्यावहारिक व्याकरण पर 1051 से अधिक विश्लेषणात्मक निबंध संगृहीत हैं। इसे विश्वभर में 64.5 लाख से अधिक बार पढ़ा जा चुका है।

भोजइंग्लिश (Bhojinglish): एक अभिनव द्विभाषी शिक्षण-मॉडल, जो मातृभाषा भोजपुरी के भाषाई ढांचे का उपयोग करके पहली पीढ़ी के विद्यार्थियों के लिए अंग्रेजी साहित्य और व्याकरण की जटिल अवधारणाओं को सहज बनाता है।

भोजपुरिया (bhojpuriyaa.com): भोजपुरी की मौखिक लोक-परंपराओं और आधुनिक काव्य-शास्त्र के संरक्षण, अभिलेखीकरण और समालोचनात्मक विस्तार को समर्पित एक वेब पोर्टल।

@langlitlite: एक सुलभ व्याख्यान मंच, जो विश्वविद्यालय-स्तरीय छंदशास्त्र (Prosody), पाठ्य-विश्लेषण और साहित्यिक समालोचना को दुनिया भर के स्व-अध्ययनरत विद्यार्थियों तक पहुँचाता है।

निष्कर्ष

डॉ. हरेश्वर राय उच्च अकादमिक अनुसंधान और अपनी मातृभूमि के प्रति अगाध निष्ठा के बीच एक दुर्लभ संतुलन साधते हैं। एक तरफ जहां वे प्रवासन, अस्मिता और उत्तर-औपनिवेशिकता जैसे जटिल विषयों पर उच्चस्तरीय शोध-मार्गदर्शन प्रदान करते हैं; वहीं दूसरी ओर, उनके भोजपुरी काव्य-संग्रह, हमार पहचान ह भोजपुरी और हमरा प्यार हो गइल, उनकी संस्कृति और माटी के प्रति अनन्य प्रेम को उजागर करते हैं। ज्ञान को अकादमिक सीमाओं से बाहर लाकर जन-सामान्य तक पहुँचाने वाले डॉ. राय, एक जन-प्रतिबद्ध विद्वान के उत्कृष्ट प्रतीक हैं।

द्वारा:
प्रो. नीता सिंह
अतिथि विद्वान, अंग्रेजी विभाग
शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सतना (म.प्र.)

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